Tuesday, 5 September 2017

Ek Choti si Kahani

बच्चे स्वभाब से बड़े निर्मम होते है |
वो जब पॉचवीं कक्षा में पहले दिन आई तो हम सब उसे टिफिन- ब्रेक में घेरकर खड़े हो गए और जोर-जोर से कहने लगे –“मोटी....मोटी” …… और वो, बुत बनकर चुपचाप खड़ी रही, सहमी हुई निगाहों से हम सबको देखती रही और दॉत से हाथ के नाखुन काटती रही.... !
जाड़े की छुट्टी के बाद पॉचवीं क्लास का पहला दिन था । हम सब नई-नई किताबें और कॉपियों को बार-बार देखते, सूंघते, चमकीले ब्राउन-कवर को सहलाते हुए खुश थे,और वो क्लास के सबसे पीछे और कोने के सीट पर चुपचाप बैठी थी। हिन्दी मिस का क्लास था। हम सब उनसे बहुत डरते थे। मिस अपने सफेद शॉल को लपटे, हाथ में रजिस्टर लिए कक्षा के अन्दर आई और काले फ्रेम वाली चश्मा लगाकर छात्राओं की उपस्थिति लेने लगी।
अन्त में उन्होंने पुकारा- “मीनू शरण..,” उसने इतने धीरे से बोला- “ उपस्थित मिस..”, जो कि मिस को सुनाई नहीं दिया। 
“ कौन है..? खड़ी हो जाओ.....” ।                                                                                        
 हम सब सहम गए, वो जैसे ही खड़ी होने लगी उसके डेस्क आगे के तरफ खिसका, कुर्सी पीछे गिर गया। उसके शरीर का भार ही इतना था। कक्षा के सारी छात्रायें ठहाके लगाकर हॅसने लगीं। 
“ शान्त... ”, - मिस ने डॉटा।    
 हम सब चुप, पर हमारी आँखें उसकी तरफ देखकर हँसे जा रही थी, मानो बोल रही हो “मोटी...मोटी... “।                    
“ तुम नई आई हो..? कल से सामने के सीट पर बैठा करो, यहाँ आओ ”।                           
 और मीनू थप-थप करती हुई ब्लैक बोर्ड के पास आकर खड़ी हो गई।     
 “ अपना परिचय दो।”
हम सब अपने हाथ मुहँ पर रखकर हँसते रहे। मीनू चुपचाप सर झुकाकर खड़ी रही। कुछ न बोली। मिस ने उसके सर पर हाथ रखा और प्यार से उसके मुहँ को उठाया।
उसके गाल पर दो बूदँ ऑसू टपक गई।
“ मीनू.., कोई बात नहीं, तुम जाकर बैठ जाओ।“ - मिस ने कहा।
  थप-थप करती हुई मीनू अपनी सीट पर जाकर बैठ गई।
“ बच्चों... पृष्ठ-10 खोलो.., कविता है ‘पुष्प की अभिलाषा’ कवि- ‘माखनलाल चतुर्वेदी’, अब हम बारी-बारी से इसका रीडिंग लगाऐगें..। इस कोने से शुरु करते है। तुम दो पंक्ति पढ़ोगी, फिर तुम दो पंक्ति, फिर अगला...।“
मैंने जल्दी से गिनती किया क्रमानुसार मेरा नम्बर सातवां था, और कविता में 12 पंक्तियॉ थी।
मतलब मेरी बारी नहीं आएगी। मैं खुश होकर कविता सुनने लगी। सीमा, मेरी सहेली ने कविता की अंतिम दो पंक्तियॉ पढ़ दी।
“ अब एक बार और पाठ करते है,अनन्या तुम शुरु करो।“ - मिस ने कहा।
 मेरे हाथ-पैर ठण्डे होने लगे, मैं पुस्तक लेकर खड़ी हो गई।
“ क्या हुआ शुरु करो ” |
“ उ..उ..उष्प की अभिलाषा’ कवि माखनलाल ह..ह..हतुर्वेदी।“
 सारे बच्चे हँसने लगे।
 “ उष्प...उष्प... हतुर्वेदी ”, सबने ठहाके लगाए। मैं झेप गई।
मैं बुरी तरह हकलाती थी,और उस उम्र के बच्चे,जो निर्मम,निष्ठुर होते है, उन्हें चिढ़ाने में आनन्द जो मिलता था।
** 
 इन्सान में अगर एक कमी हो, तो ईश्वर किसी दूसरे तरह से उसे पूरा करते हैं। मैं हकलाती तो थी, पर लिखने में मुझसे आगे कोई न था। अंग्रेजी लेख हो या हिन्दी, मैं हमेशा कक्षा में अव्वल आती थी।  मेरा लिखा हुआ उत्तर, लेख आदि सबको मिसाल दिया जाता था। परीक्षा के पहले मेरी कक्षा की लड़कियॉ मेरी कॉपी लेने के लिए मेरी खुशामद करती थी।  
बस वही दो समय था – अर्धवार्षिकी और वार्षिकी परीक्षा के पहले, जब मुझे दोस्ती सौदा पर मिलता था। “मुझे एक दिन के लिए अपनी अंग्रेजी कॉपी दोगी..?”
मेरी कक्षा की सहेलियॉ पूछ्ती, मेरी चुप्पी देखकर वो सौदा करती।
“प्लीज दे दो ना, कल से तुम हमारे ग्रुप में बुढ़िया कबड्डी खेलना, मैं सबसे बोल दूंगी।“ मेरी आँखें चमकने लगती ।
 “ सच ?”  
“ हॉ, हॉ, सच, दे दो प्लीज..”मैं जानती थी कि यह एक दो दिन की बात थी। 
यह मैं जानती थी, पर फिर भी उन दो दिनों का लालच मुझे उनको इनकार करने से रोकता था।
टिफिन-टाईम बुढ़िया-कबड्डी के दोनों टीमें कोशिश करते कि मैं दूसरे टीम में रहूं। खेलने के बहाने मुझे ढ़केल देते और फिर मेरे जैसे हकलाते हुए बोलते और हँसते।
मैं बहुत अकेलापन महशुस करती थी, स्कूल जाने की इच्छा नहीं होती। मॉ और बाबा को कुछ बोल न पाती।
एक दिन अकेले मैं अपना टिफिन खा रही थी। मैदान के एक प्रान्त पर टिफिन करने का एक एस्बेस्टर का शेड था। वहाँ सिमेंट के चबूतरे बने हुए थे, जहॉ लड़कियॉ मिलजुल के अपना टिफ़िन खाती थी। कोई रोटी सब्जी, तो कोई सैंड़विच, तो कोई पूरी-हलवा। एक दूसरे के टिफिन बॉक्स से छीना-झपटी करते हुए, हँसते खिलखिलाते मजेदार बातें करते हुई सब लड़कियों को मैं चुपचाप देखती रहती थी। 
शेड के पास एक गुलमोहर का पेड़ था | लाल लाल गुलमोहर के फूल और छोटो छोटी हरी पत्तियों से भरी वोह पेड़ मुझे अजीब सी सुकून देती थी |
मैं खोई हुई सी उन लाल फूलों एवं हरे पत्तों की ओर देख रही थी, मन में ढ़ेर सारे ख्याल आ रहे थे, अचानक मेरे कक्षा की एक झुंड‌‌-लड़कियाँ आई और मुझे धकेल दिये, रोटी, सब्जी जमीन पर गिर गया।
लड़कियाँ हँसने लगे।
तभी, वो मोटी मीनू पता नहीं कहाँ से आ धमकी और उन लड़कियों को जोर का धक्का दे दी, दो-चार गिर पड़ी और बाकि भौचक्का रह गई।
“ कोई इसे हाथ लगाकर देखे...।“ वह गुर्राई।
 उसकी मोटी और सशक्त बदन, हाथ पैर, गुस्से से लाल चेहरा, काले घुंघराले बाल देखकर सब डर गये और चुपचाप वहॉ से खिसक गई। उसदिन से हमदोनों दोस्त बन गए । हम कक्षा में एक साथ बैठते, एक साथ नाश्ता करते,बातें करते, परन्तु एक अजीब बात इनमें ये है कि, मेरे माँ और बाबा की तरह जब मैं उसके साथ भी बातें करती, तो मैं बिल्कुल नहीं हकलाती थी।
मेरे दिन सुहाने हो गए। मुझे स्कूल जाने में खुशी होने लगी।
मुझे एक दोस्त जो मिल गई थी।
मैं उसे प्यार से “मोटी मीनू” पुकारती और वो मुझे “हक्लु अनु” ।
** 
 कभी-कभी जीवन में कोई आता है जो हमारी जिन्दगी बदल देता है। हम दोनों के लिए वह हमारी हिन्दी मिस ‘किरण माथुर’ थी। मिस किरण से हम सब बहुत ड़रते थे। वह कदाचित ही हँसती थी। अनुशासन और समय की पाबंद, जब वो अपनी मोटे काले फ्रेम वाले चश्में से हमारे तरफ देखती थी, तो हमारे हाथ पैर जैसे ठण्डे हो जाते थे, पर मुझे उन आँखों में एक अजीब सी करुणा भी दिखती थी।
 एक दिन अंग्रेजी के क्लास में मैं बहुत बुरी तरह हकलाई। बाकि लड़कियाँ ने मुझे बहुत चिढ़ाया और मैं रो पड़ी। अगला क्लास हिन्दी की थी। मिस किरण आई, उन्होंने मुझे और मीनू को बुलाया और स्टाफ-रुम में उनके सीट पर ले गई। हम दोनों सहमे खड़े थे उनके सामने। रोने से मेरी आँखें लाल और सूझी हुई थी।
उन्होंने बहुत प्यार से मेरे सर पर हाथ फेरा और मुस्कुराई।
“ अनन्या, मेरी एक बात ध्यान से सुनो..., इस दुनिया में हम सब अलग-अलग है, पर हम सबों में कुछ न कुछ है जो विशेष है। तुम अपने आप को कभी किसी से कम नहीं समझना। मुझे पता है कि तुम बहुत अच्छा लिखती हो, तो क्या हुआ जो कि तुम थोड़ा बोलने में रुक जाती हो ?”
 मेरे आँखों से टप-टप आँसू झरने लगे।    मीनू मेरा हाथ पकड़ रखी थी।                
“मीनू तुम्हारी इतनी प्यारी सहेली है... मेरा एक सुझाव है, बोलो तुम दोनों मानोगी...?”
“ हाँ मिस... ”
“कल से रोज अनन्या कुछ लिखेगी और टिफिन करने के उपरान्त मीनू उसे पढ़ कर सुनाएगी। प्रत्येक शुक्रवार तुम दोनों मुझे बताओगे।“  
बस उस दिन से मैंने लिखना शुरु किया। कभी अंग्रेजी में लिखती, तो कभी हिन्दी में, कभी कोई लेख, तो कभी कविता। और मीनू उसे जोर-जोर से पढ़कर सुनाती।
मीनू के पढ़ने का कायदा इतना उत्कृष्ट था कि मुझे अपनी ही लेखनी पर गर्व होता था।
हम शुक्रवार के लिए इन्तजार करते थे। किरण मिस को बताते,और वो कुछ-न- कुछ पढ़कर सुनाने को कहती। वो हमें बहुत सराहती और हम प्रोत्साहित होकर और बेहतर लिखने एवं पढ़ने की कोशिश करते।
समय बीतता गया ..
.मेरी लिखाई अच्छी होती गई।   
मोटी मीनू सुवक्ता होती गई।
मैं कहानियॉ लिखने लगी | विद्यालय के पत्रिका में, मेरी लिखी हुई कविता और कहानी स्कुल में बहुत चर्चित हो गई।  मीनू तर्क-वितर्क व्याख्यान-शैली में सबसे आगे निकल गई। अन्तर्विद्यालय प्रतियोगिता में मीनू ने प्रथम स्थान पाया।
जाने कब हमारे सहपाठीलोग हमें कभी इज्जत से और कभी ईष्या की नजरों से देखने लगे।
पासा पलट चुका था, जो लोग हमें चिढ़ाते थे, ठट्ठा करते थे, वो लोग अब हमसे दोस्ती करने के लिए गिड़गिड़ाने लगे।
और सबसे अनोखी बात तो यह थी कि आत्मविश्वास बढ़ने से मेरा हकलाना भी बन्द हो गया।
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कभी-कभी मैं सोचती हूं कि अगर उस दिन किरण मिस ने हमें सहारा नहीं दिया होता तो हम आज क्या होते।
मेरी और मीनू कि जिन्दगी कैसी होती।
अगर मैं न हकलाती, और मोटी मीनू मोटी न होती तो क्या होता।
आज मैंने मीनू से Skype पर बात की। मोटी मीनू आजकल United States की विख्यात Motivational Speaker है।
जब भी मैं पटना जाती हूँ किरण मिस से जरुर मिलती हूँ।
इसबार उनके लिए मैं एक विशेष तोहफा लिए जा रही हूँ, मेरा नया उपन्यास जिसे मैं उनके नाम समर्पित की हूँ, उन्हीं के कर-कमलों में अर्पित कर अपनी लेखनी को धन्य करुँगी।                          
                                                                   ***

2 comments:

  1. कहानी दिल को छु गयी। जीवन के सकारात्मक पहलु को उजागर कर दी। आप को अभिनन्दन!

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